रविवार, 14 दिसंबर 2008

"मैं हिन्दु देश का मुस्लमान.."


मुझे अपनी “सीमा” में रहना है।
मैं अंतरिक्ष समझता हूँ, दुनियाँ जानता हूँ।
साँस लेने, खाने-पीने-सोने के भीतर-बाहर, मेरा एक देश है....
जिसे मैं पहचानता हूँ।
मैं एक हिन्दु देश का मुस्लमान हूँ।
मुझे अपनी “हदें” पता है, जैसे हर एक आदमी की अपनी ’हद’ है।
पर अभी कुछ ऎसी तिरछी-आड़ी लक़ीरें दिखती हैं।
जिसमें मेरी “हद”, वह “हद” नहीं है जो सबकी है।
यहाँ तक कि... मेरी “हद” अब “हद” भी नहीं रह गई है,
वह “सीमा” हो गई है।
अब मुझे अपनी “हद” में नहीं...
मुझे अपनी “सीमा” में रहना है।
अब मैं....
मैं अंतरिक्ष समझता हूँ, दुनियाँ जानता हूँ।
साँस लेने, खाने-पीने-सोने के भीतर-बाहर, मेरा एक देश है....
जिसे अब मैं नहीं पहचानता हूँ।

शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

पतंग...


मैंने अपनी पतंग बहुत रंगीन बनाई थी...।
भरी दोपहर में मैं उसे उडाना चाहता था।
इच्छा थी कि एक बार उसे आसमानी हवा लग जाए, और वह गोल-गोल धूमती हुई,
उड़ जाए वहाँ, जहाँ आज तक कोई पतंग ना पहुचँ पाई हो।
बाज़ार का ध्यान उस वक्त नहीं था।
वह कौन सी उम्र होती है जब हमें बिकना ही पड़ता है... पतंग नहीं बिकती।
’पतंग तो उड़ेगी ही, आसमानी हवा कोई बंद थोड़ी हो जाएगी...’ जैसी बातों को बगल में दबाए,
हम बाज़ार में भाग रहे होते है।
फिर एक क्षण आता है जब पहली बार हमें एक रंग की ज़रुरत पडती है और हम अपनी पतंग का एक कोना फाड़ चुके होते है।
रंगों की ज़रुरत कभी खत्म नहीं होती... पतंग फटती रहती है।
बची रह गई पतंग की दो पतली लकड़ीयों से... बाद में हम आसमानी हवा की कल्पना करते हैं।
’पतंग को आसमानी हवा लगेगी और वह वहाँ उड़ेगी जहाँ कभी कोई पतंग नहीं पहुच पाई..’ जैसी बातें हमें बचकानी लगने लगती है.. जिनपर अब महफिलों में बैठकर हम जी भरकर हँसते है।

गुरुवार, 10 जुलाई 2008

विदुषक...


वो हंस देती थी..,
कहती थी-’तुम विदुषक हो..।’
अब वो अपना खाना खाती,
अपने हिस्से की अलग कहीं,
हवा पी लेती है।
नींद आता है तो कहीं सो रही होती है।
पर जब भी वो हंसना चाहती है...
कहती है-’तुम्हें याद कर लेती हूँ,हसीं आ जाती है।’
जब वो जा रही थी... कहीं..,
तब भी उसने मुझसे कुछ कहा था।
पर मैंने कुछ और ही सुना... और देखा...
वो हंस रही है।
सोचता हूँ, अभी वो कहीं अगर मुझसे टकरा जाएगी...
कहीं भी...
सड़क में, बाज़ार में, किसी मोड़ पर...
तब शायद वो मुझे मेरे नाम से ही पुकारेगी...
पर मैं इस तरफ खडे होकर...
विदुषक ही सुन रहा होऊंगा।
और चुप रहूगाँ...
मानों वो किसी और को आवाज़ दे रही हो...।
फिर मैं ऊपर आसमान की तरफ देखूगाँ,
अगर बादल होगें तो उनके बारे में सोचूगाँ,
और अगर धूप होगी,
तो अपने पसीने की बूंद का टपकना देखूगाँ।
इस बात पे मैं वापिस,
विदुषक हो जाऊगाँ।

रहस्य..


पीड़ा,बूंद-बूंद टपकती है, खाली घर में...
जैसे- थमे तालाब में कोई बच्चा..
बार-बार पत्थर मारे।
उस पत्थर से बने वृत्त,
पूरे तालाब को अस्थिर कर देते हैं।
घर स्थिर होने में अपना समय लेता है।


पीड़ा क्या है?
शायद अपने किसी रहस्य का बहुत भीतर बहते रहना।
पर किसी को पता चलते ही वो रहस्य..
पीड़ा नहीं रह जाता,
वो दुख हो जाता है...।


पीड़ा का टपकना... पलकों के झपने जैसा है।
अगर पलकों का झपकना..
किसी ज़िद्द में रोक दूँ...।
तो... आँखें छलक जाएगीं..
और पीड़ा, दुख बन जाएगा।

सूटकेस...


मेरी पल्कों के बाल कई बार मेरी हथेली तक आए हैं,
पर मैंने कभी उन्हें आँखें बंद करके उड़ाया नहीं।
मैंने कई बार तारों को भी टूटते हुए देखा है,
पर मेरी आँखें तब भी खुली रही...
आँखें बंद करके मैंने कभी कुछ मांगा नहीं।
उस सुख की भी कभी तलाश नहीं की...
जिस सुख को जीते हुए मेरी आँखें झुक जाए।
पर एक टीस ज़रुर है...
वो भी उन सुखों की जो मेरे आस-पास ही पड़े थे,
कई बार मेरे रास्ते में भी आए, पर पता नहीं क्यों,
मैं उन्हें जी नहीं पाया....।
अपने ऎसे बहुत से सुखों को, जिन्हें मैं जी नहीं पाया...
मैंने अपने इस पुराने सूटकेस में बंद कर दिया है...।
कभी-कभी इसे खोलकर देख लेता हूँ...
इसमें बड़ा सुख है...
और इस सुख को मैंने कभी अपने इस पुराने सूटकेस में,
गिरने नहीं दिया।
इसे हमेशा अपने पास रखता हूँ।
जिन सुखों को जी नहीं पाया...
उन सुखों को महसूस करना कि, कभी इन्हें जी सकता था।
ये अजीब सुख है।
और जिन सुखों को मैं जी चुका हूँ,
उनका अपना अलग बोझ है,
जिसे ढ़ोते-ढ़ोते जब भी थक जाता हूँ....
तब अपना पुराना सूटकेस खोल लेता हूँ...
और थोड़ा हल्का महसूस करता हूँ।

सोमवार, 9 जून 2008

मानव...



मुझे हर बार मानव होने में कितना वक्त लगता है।


मैं हसंता हूँ....
जैसे कुछ छूट जाता है।


चुप होता हूँ...
तो कोई पास आकर फुसफुसाता रहता है।


जब तक बोलता हूँ...
कोई दिखता नहीं है।


चुप होते ही जंगली कुत्ते चारों ओर से धेर लेते है...
जैसे मैं कोई धायल जानवर हूँ।


और बाक़ी सब ताली बजाने और बजवाने के बीच के खेल हैं।


मेरे तुम्हारे, होने और नहीं होने में...
कोई एक आदमी था जो चल रहा था।
वो आज भी चलता है।
अभी... ठीक इसी वक्त...
वो मेरे बगल में खड़ा है।
नहीं वो मैं नहीं हूँ...।


मुझे तो मानव होने में बहुत वक्त लगता है।

बुधवार, 28 मई 2008

एक शब्द...


एक शब्द...
थर-थर कांपता-सा,
पन्ने पर गिरा।
एक कहानी...
कविता के सुर में कही गई और नहीं कहीं गई,
जैसी बातों में पूरी हुई।
नाटक के से सुर में मैंने उसे,
डरते-डरते पढ़ा।
कहीं एक बच्चे ने,
थमे हुए पानी में एक पत्थर फैंका...।
और कहीं दूर,
अबाबील नाम की चिड़िया उड़ गई।

आप देख सकते हैं....

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