रविवार, 17 मई 2009

रंग...


अगर मैं तुम्हें पेंट कर सकता तो...?

रंगों के इस जमघट में...

कौन सा रंग हो तुम???

नीला... आसमान सा कुछ..?

गुलाबी तो कतई नहीं..

या हरा..  गहरा घने पेड़ जैसा कुछ।

पीला तो नहीं हो..

सफेद!!!.. नहीं, नीरस सफेद नहीं.. बादलों सा भरा हुआ सफेद।

कौन सा रंग हो तुम?

 तुम्हें बनाते हुए...अक़्सर मैं,

 बीच में ही कहीं छूट जाता हूँ।

उन रंगों में... उन ब्रश के चलाने में..

पकड़ा-सा जाता हूँ मैं...

पहाड़ों और नदियों के बीच, खाली पड़ी जगह में कहीं।

रंगों में लिपा-पुता जब भी मैं तुमसे मिलता हूँ...

तुम पूछती - यह क्या मैं हूँ?

मैं कह देता... ’अभी यह पूरा बना नहीं है...।’

मैं कहना चाहता हूँ कि...

तुम बन चुकी हो...

यह तुम ही हो..

मैं तुम्हारा देर तक ’अकेले खेलना’ रंगना चाहता हूँ।

नहीं तुम्हारा अभी का खेलना नहीं..

तुम्हारे बचपन का खेल..।

पर..

 किसी रंग में तुम अकेले मिलती हो..

तो कोई रंग महज़ तुम्हारे साथ खेलता है।

तुम बन चुकी हो...

 पर वह रंग मैं अभी तक बना नहीं पाया जो...

अकेले खेल सकें...।

कत्थई फूल...


 

जले हुए कागज़ों पर वह अपना नाम ढूंढ़ती थी।

हाथ काले होने के डर से...

फूंक-फूंक कर पूछती थी।

कत्थई बड़े-बड़े फूलों को सुखा देती थी,

पढ़ी हुई किताबों के बीच में छिपा के सोती थी।

रोने की एक छोटी सी जगह पर,

देर तक खड़ा रखती थी।

दूसरों के आईनों में खुद को देखा करती थी।

उन आईनों के सुरक्षित धेरे में मैं नहीं बंध पाया।

बेईमानी की रेत पर ईमानदारी की एक छतरी मैं खोले रहा।

छतरी की छाह... ओकात की चादर जितनी छोटी थी..

मैं पैर फैलाए अकेले पड़ा रहा।

लोग धूप-छाँव के खेल में...

भीतर-बाहर जलते रहे।

पढ़ी हुई काफ़्का की किताब में...

सूखे कत्थई फूल मैं चुनता रहा।

जले हुए नामों को अकेले में पढ़ता रहा।

दूसरों की नमी को अपने लिखे में महसूस किया।

अपनी छोटी सी चादर पर, बहुत सी पढ़ी हुई किताबें लिए, बहुत देर तक बैठा रहा।

पढ़ी हुई किताबें,

अभी भी...

 पढ़ी जाना बाक़ी रहीं।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

श्रम...


क्या हमारा श्रम तोला जा सकता है?
क्या कहा जाएगा कि ’इसका तो इतना ही होगा भाई’
या कहा जाएगा कि ’यह काफी नहीं है।’
मैंने श्रम दान किया है...
इस तरह की कोई बात भीतर से उठेगी,
और मेरा सारा श्रम...
हाशिए पर रख दिया जाएगा।
यूं बाज़ार में भाव-तोल करना मेरे खून में है,
धोखा खा जाऊगाँ का डर हमेश बना रहता है।
पर अपने श्रम के साथ भाव-तोल जाता नहीं,
हाँ यह दोग्लेपन की बात है,
पर यह अंतर्मुखी श्रम है...
इसमें श्रम,
अंतर्मुखी नाम की एक चिड़िया करती है।
और उस श्रम को बाहर कोई ओर सहता है।
डरा हुआ मैं बाहर हूँ...
इसलिए वह भीतर उड़ती फिरती है।
यहाँ डर धोखे का नहीं है...
यहाँ डर है...
उस चिड़िया का पसीने में बदल जाना।

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

दर्शक...



वह कहती थी इसे बचाकर रखते हैं....
यह हमारी धूप है...
जब हम ठिठुर रहे होगें तो यह काम आएगी।


फिर यहाँ वहाँ कुछ काँटे भी बीना करती थी....
कहती थी... जब दूसरे गड़ेगें तो इनसे उन्हें निकालूगीं...।


कुछ चीज़े छाती से चिपकाकर बुनती रहती थी....
कहती थी... जब हमारे जैसे कोई होगें तो उन्हें पहनाऊगीं।


सुबह उठते ही घर जमाती, और शाम को घर सजाना सोचती।
सुबह खुश रहती, शाम होते ही चुप हो जाती।


कहती थी सपने सच्चे होते है
जब सोती थी तो कुछ बुदबुदाती रहती थी।
उस बुदबुदाहट के कुछ पात्र थे, आवाज़े थी, हँसी थी।
वह दूसरी दुनियाँ थी...।
जब तक मैंने उस दुनियाँ को जाना, सुना..
मैं दर्शक हो गया।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

ख़त...


ख़त, तुल्नात्मक अध्ययन में...
हमेशा धीमी गति से चलने वाला... घोड़ा होगा।
पर भाव फेंकना,
गर प्रमुख है,
तो मैं इस घुड़सवारी के खेल में,
खच्चर होना चाहूगाँ।


और अगर इस खेल में गति प्रमुख है...
तो मैं तुम्हारा नाम लिखने में ही...
बहुत पहले यह खेल हार चुका हूँ।

सोमवार, 26 जनवरी 2009

आलू...


अपनी छोटी सी मर्यादा के भीतर काम करते हुए...
भूख चार फल्लांग बाहर... पड़ी दीखती है।
अपनी मर्यादा का बिस्तरा...
भूख के पास जाते ही कटोरा हो जाता है।
सपने में खाते रहने से भूखा हूँ का भय,
’क्या भूखा ही रहूगाँ?’ तक पहुच जाता है।


’अतीत की मिट्टी खोदते रहने से आलू मिलेगें’ की कला मैंने कभी सीखी नहीं।
सीखूगाँ की उम्र भी बिस्तरे में पड़े-पड़े मैं बिता चुका हूँ।
भूख और मर्यादा के बीच में रेंगते हुए...
रात, माँ की कोमल उंगलियों की तरह काम करती है...।

सपने में भूख का भय, अपने से दूर हो जाने का भय है।
बिस्तरा कभी-कभी मुझे पसीने की नदी लगता है....
जिसमें गोते लगाकर,
भाग-भागकर मैं लगातार खुद को ढूढ़ंता रहता हूँ।

बिस्तरे पर भागते-भागते जब भी थक जाता हूँ,
तो आँखों के सामने... ढेरों आलू पड़े मिलते हैं।

’तुम आलू क्यों नहीं हो जाते हो...?’
यह प्रश्न अपने, बड़े अपनेपन से पूछते है।
आलू हो जाना, आलू को खाने जितना सरल है।
’फायदे’ जैसे शब्द इसके साथ बहते चले आते हैं।
सोचता हूँ आलू हो जाऊँ...
और खत्म कर दूँ इस बिस्तरे और कटोरे के बीच के खेल को।

पता नहीं कहाँ से...
रेंगते हुए कुछ शब्द, शरीर छूने लगते है।
एक कुँआ दीखने लगता है,
छप-से एक गेंद उसमें गिर जाती है...
और मैं कूद पड़ता हूँ।

शनिवार, 20 दिसंबर 2008

अक़्स...


वह पानी...
उसमें देखा गया अपना ही अक़्स...
पुराने किसी एल्बम के पीले पड़ गए चित्र जैसा...।
रुका-थमा... हतप्रभ सा।
मेरे जानने के बाहर का वह....
मेरी विकृतियों से दूर कहीं... छुपा बैठा है नदी के नीचे कहीं।
दबोच लूँ उसे... कहीं।
नहा लूँ उसमें कभी।
नहीं, छूटा नहीं पड़ा है वह नदी के नीचे कहीं।
वह यहाँ भी है... आस-पास ही कहीं...।
जीवन के गुणा-भाग में,
वह राह चलते कभी-कभी छलक जाता है...।
खाली घर में जब भी कभी दाखिल होता हूँ....
वह बत्ति जलाने के ठीक पहले...
दिख जाता है कभी....।
मूक, शांत सा, हतप्रभ...।
यह मेरा सारा लिखा....
उस पीले पड़ गए अक़्स के सामने, बोझ सा लगता है।
यूँ अपनी बचकानी चालाकी में मैं लोगों से कहता फिरता हूँ कि...
मेरा सारा लिखा,
उस हतप्रभ आँखों के पूछे गए ढ़ेरों सवालों के जवाब सा है।
इस झूठ से हर बार हंसी आती है...
और फिर उस हंसी से... ग्लानी...।
उस अक़्स में कोई सवाल नहीं है....
शिक़ायत भी नहीं...
एक अविश्वसनीय, निश्छल समर्पण सा है...।
जिसे देखकर...
मैं मूक हूँ...
शांत हूँ...
और हतप्रभ...।

आप देख सकते हैं....

Related Posts with Thumbnails