
खिड़की से खड़े, पेड़ ताकते हुए..
उस पेड़ को भूल जाना...।
छोटी लाल-गर्दन की चिड़िया का उस पेड़ पर आना-बैठना-उड़ जाना...
पेड़ का उड़कर दृश्य में वापिस आ जाना है।
www.aranyamanav.blogspot.com ( मौन में बात...) www.manavplays.blogspot.com (मेरे नाटक..)





कतरे पन्ने हाथ में,
एक टूटा हुआ पेन...
लंगड़ाते-लंगड़ाते एक दिन मैं रास्ता पार कर लूगां।
अपनी थूक से पेन की निब को गीला करके...
मैं गाड़ियों को रोकूगाँ।
उनकी रफ्तार को महज़ सांस लेने की सरलता तक ले आऊगाँ।
अगर तो वह चीख़ते-चिल्लाते हुए अपने हार्न बजाने लगेगें...
तो मैं सड़क के उस तरफ उन्हें...
ज़मीन पर लेटा पड़ा बरग़द दिखाऊगाँ।
मैं डरते-डराते रास्ता पार नहीं करुगाँ।
गर रफ्तार फिर भी नहीं थमी...
तो मैं अपने सारे कतरे पन्ने.. हवा में उड़ा दूगाँ।
जब वह फड़फड़ाते हुए नीचे आएगें...
तो मैं उन कतरे पन्नों के नीचे...
लंगड़ाता-लड़खड़ाता नाचूगाँ।
अपने टूटे हुए पेन को...
बीच रास्ते में गड़ा दूगाँ।
जब अंत में सब खाली हो जाएगा...
तो मैं सीधे चलते हुए..
रास्ते के उस तरफ जाऊगाँ...
और उस उखड़े पड़े बरग़द से लिपटकर...
सो जाऊगाँ...।

कोई पीछे खड़े होकर कहता है...
खरगोश... मेरे दोनों कान खड़े हो जाते है।
शिकारी ढूढ़ने का गुण मेरे खून में है।
भागकर अपने कोनों में छुप जाना मेरा हथियार है।
कोनों में दुबके हुए शिकारी की कल्पना, मेरा खेल है।
मेरा कोना जिस घर में है...
उसमें गाजर का आगन है।
भूखे पेट मर जाने से,
शिकारी का सामना करने का इतिहास मैंने रटा है।
इतिहास को तोड़-मरोड़कर...
मैं चोर हो जाता हूँ।
डरा हुआ देर रात गाजर खाने निकलता हूँ।
‘करच-करच, खरच-खरच..’ की आवाज़ से खुद ही डर जाता हूँ।
गाजर खाना बंद करके, यहाँ वहाँ ताकता हूँ।
शिकारी, मेरा मकान मालिक सो रहा है।
उसका किराया, मेरा काम है।
मुझे पता है एक दिन वह मुझे खा जाएगा।
बचने की सारी कोशिशों की मेरी कहानियाँ...
खत्म हो जाने के डर की ‘करच-करच, खरच-खरच..’ में....
देर रात, चोरी से पाई हुई गाजर हैं...।