बुधवार, 20 फ़रवरी 2008

खिड़की से आकाश...



थोड़े में बहुत कुछ देख लेना,
और बहुत कुछ होने पर, हमारा आँखे बंद कर लेना।
मैं कभी-कभी अपना सबसे खूबसूरत सपना याद करता हूँ।
मेरा सबसे खूबसूरत सपना भी कभी,
बहुत खूबसूरत नहीं था।
मेरे सपने भी- थोड़ी सी खुशी में, बहूत सारे सुख, चुगने जैसे हैं,
जैसे कोई चिड़िया अपना खाना चुगती है।
पर जब उसे एक पूरी रोटी मिलती है।
तो वो पूरी रोटी नहीं खाती है,
तब भी वो उस रोटी में से,रोटी
चुग रही होती है।
बहुत बड़े आकाश में भी हम अपने हिस्से का आकाश चुग लेते हैं..।
देखने के लिए हम बहुत खूबसूरत और बड़ा आसमान देख सकते हैं।
पर जीने के लिए...
हम उतना ही आकाश जी पाऎंगे...
जितने आकाश को हमने,
अपने घर की खिड़्की में से जीना सीखा है।

'जिया जा चुका...'



जितना भी गुज़र चुका है... वो सपना ही है।
'जिया है'... का विश्वास कम है,
फिर भी 'जिये जा चुके के पिंजरे'-में बंद हूँ,
और अब जो जीना है...
उसे 'जिये जा चुके के पिंजरे'-से हाथ बाहर निकालकर..
छूने की कोशिश करता हूँ।
'जिया जा चुका'-जीने नहीं देता है।
मैं बैठा रहता हूँ...
खडे होने का डर है...
डर है-कहीं मेरे खडे होने से 'कोई जिया जा चुका'
पिंजरे से बाहर न गिर जाए,
क्योंकि बाहर तो अभी जीना है।
'जीया जा चुका' बाहर के जीने में कहीं खो न जाए।

'बादल...'




जब खाना खाने के बाद तुम,
थाली में अपनी उंगलियों से चित्र बनाती हो।
तो पता नहीं क्यों मैं उस वक्त, बादलों के बारे में सोचता हूँ।
उस समय एक चुप्पी रहती है।
अजीब सी लम्बी... बहुत लम्बी चुप्पी...।

शायद तुम्हें पता नहीं है कि तुम,
अपनी उंगलियों से थाली में क्या बना रही हो?
पर मैं उन बादलों को देख रहा हूँ....
जिन्हें कभी तुम घना कर देती हो,
तो कभी एक भी बादल तुम्हारी थाली में नहीं होता....

फिर तुम एक गहरी सांस भीतर लेती हो..और उसे छोड देती हो।
'चुप ही रहूँ...'
'या कुछ कह दूँ..'
जैसे विचारों के बहुत से हाथी और खरगोश,
बादलों मैं बनते-बिगडते रहते हैं।

और अचानक तुम बादलों को अकेला छोडकर,
थाली के किनारों को ज़ोर-ज़ोर से रगडने लगती हो।
जैसे जो बादल अभी-अभी तुमने बनाए थे...
वो बस बरसने ही वाले हैं।

तभी एक बूँद थाली में आकर गिरती है...
और सारे के सारे बादल.... भीग जाते हैं।

आप देख सकते हैं....

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