बुधवार, 28 मई 2008

एक शब्द...


एक शब्द...
थर-थर कांपता-सा,
पन्ने पर गिरा।
एक कहानी...
कविता के सुर में कही गई और नहीं कहीं गई,
जैसी बातों में पूरी हुई।
नाटक के से सुर में मैंने उसे,
डरते-डरते पढ़ा।
कहीं एक बच्चे ने,
थमे हुए पानी में एक पत्थर फैंका...।
और कहीं दूर,
अबाबील नाम की चिड़िया उड़ गई।

रविवार, 13 अप्रैल 2008

भाग्य रेखा...



मेरे हाथों की रेखाएँ,
तुम्हारे होने की गवाही देती हैं


जैसे मेरी मस्तिष्क रेखा....
मेरी मस्तिष्क रेखा,
तुम्हारे विचार मात्र से,
अन-शन पे बैठ जाती है।


और मेरी जीवन रेखा
वो तुम्हारे घर की तरफ मुड़ी हुई है।


मेरी हृदय रेखा
तुम्हारे रहते तो ज़िन्दा हैं,
पर तुम्हारे जाते ही धड़्कना बंद कर देती हैं।


बाक़ी जो इधर उधर बिखरी रेखाएं हैं
उनमें कभी मुझॆ तुम्हारी आंखें नज़र आती हैं
तो कभी तुम्हारी तिरछी नाक़।


पंडित मेरे हाथों में,
कभी अपना मनोरंजन तो कभी
अपनी कमाई खोजते हैं,
क्योंकि....
मेरे हाथो की रेखाएं मेरा भविष्य नहीं बताती
वो तुम्हारा चहरा बनाती हैं,


पर तुम्हें पाने की भाग्य रेखा
मेरे हाथों में नहीं है।

रविवार, 16 मार्च 2008

'पर जंग कभी हुई नहीं...'



पर जंग कभी हुई नहीं...


चाकू, भाले, तलवारों में धार तेज़ थी।
रणनीतियों की किताबें हम,
घोंट-घोंट कर पी चुके थे,
बदले की भावना से सब ओत-प्रोत थे।
पर जंग कभी हुई नहीं।


जंग शुरु होने के पहले की तैयारियाँ...
हमने तब से शुरु कर दी थी, जब से
'जंग' शब्द का अर्थ,
हमारी समझ में आया था।
जंग कभी भी हो सकती है- का माहौल हमने,
किस्से कहानियों से लेकर यथार्थ तक,
हर जगह बना रखा था।
पर जंग कभी हुई नहीं।


जंग के लिए एक खुला मैदान चाहिए,
खुले मैदान से विचार हमने हर जगह जमाए।
जंगल मैदान किए- शेर,चीते, हाथी सभी मैदान हुए।
खुले मैदान के लिए हम खुद.
ऊँची-ऊँची बिल्डिंगो के पिजरों में कैद हुए,
पर मैदान में रात भर कुत्ते रोते रहे....
और जंग कभी हुई नहीं...


दुश्मन अगल-बगल ही कहीं छुपा था।
उसके अईय्यार्, भीतर-बाहर,
हर जगह मौजूद थे।
यहां हमारी सेना भी तैयार थी...
अय्यारी के मुखौटे, हम भी बदलना सीख चुके थे।
पर दुश्मन छुपा ही रहा...
और जंग कभी हुई नहीं...


दुश्मन चालाक है- दुश्मन से डरो,
एसा करो-एसा मत करो,
जैसे वाक्य सभी जगह-
इश्तहारों, दीवारों पर चिपके थे।
यूँ दुश्मन को हमने कभी देखा नहीं..
पर उसके कल्पना चित्र,
पूरे बाज़ार में बिक रहे थे।
जब हम जवान थे-या-जब भी हम जवान हुए,
वक़्त-बे-वक़्त हमने, हम सभी ने...
अपनी-अपनी ज़ुबान में,
अपने दुश्मन को एक बार तो ललकारा है।
पर दुश्मन कभी सामने आया ही नहीं...
और जंग कभी हुई नहीं...


डर एक रस्सी है,
जिसपर हम सब लटके हैं,
गर ज़मीन पर चलेंगें तो दुश्मन कभी भी धर-दबोचेगा।
इस डर ने ही हमसे ये रस्सी बुनवाई है...
अब हम लटके रहना चाहते हैं,
'अंत तक लटके रहने की चाह में...'
इसी रस्सी से हम खेलते हैं...
रस्सी पर चलते हैं...
रस्सी बिछाते हैं...
रस्सी ओढ़ते हैं...
रस्सी का एक देवता भी हमने बना रखा है।
उसे बचाने के लिए.. हम सब लड़ मरेंगें।
पर असल में...
रस्सी कभी थी ही नहीं...
और जंग कभी हुई नहीं।

बुधवार, 12 मार्च 2008

छूटी हुई जगह...


दो बातों के बीच की चुप्पी,
और...
हम दोनों के बी़च की ये छूटी पड़ी हुई जगह।
उतना ही ईश्वर...
अपने बीच पाले बैठी हैं,
जितना...
हमारी एक दूसरे से...
कभी न कही गई,
असहनीय बातें।

मंगलवार, 11 मार्च 2008

दहलीज़ पार...



तुम्हारी दहलीज़ पर खड़े रहकर,
कितनी ही बार मैंने कसम खाई है कि-
'नहीं..मैं भीतर नहीं जाऊगां।'
'मैं दरवाज़ा भी नहीं खटखटाऊगां...ना।'

और कुछ ही देर में मैं तुम्हारे साथ,
तुम्हारे बगल में पाया जाता हूँ...
और भीतर पड़े हुए,
दहलीज़ पर खाई हुई अपनी कसमों को याद करता हूँ।

उन बचकाने कारणों के बारे में सोचता हूँ,
जिन्होने मुझे फिर एक बार...
दहलीज़ के इस तरफ...
तुम्हारे बगल में लाकर बिठा दिया।

सच मुझे हँसी आती है,
कैसे हैं ये कारण-
- यहाँ से गुज़र रहा था सोचा तुमसे मिलता चलूं...
- कल रात तुम्हारा सपना देखा तो मुझे लगा कि....
- आज मैं बहुत खुश हूँ इसलिए...
- हममम...!!!
- आज दिन बहुत उदास है.. तुम्हें नहीं लगा?...
- तुम्हारी माँ की बड़ी याद आ रही थी तो...
- सरप्राईज़... !!!
- नई कविता लिखी है, सोचा तुम्हें सुना दूं तो...
- एक चाय पीने की इच्छा थी इसलिए...
और...
- तुम्हें बस एक बार देखना चाहता था।

'तुम्हें बस एक बार देखना चाहता था'-
वाली बातों ने हमेशा मुझसे..
तुम्हारा ये दरवाज़ा खुलवाया है।

इन कसमों- कारणों के बारे में,
मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया...
और शायद कभी बतऊंगा भी नहीं।

बस तुम्हारे बगल में बैठे हुए...
तुम्हारी बातें सुनते- कहते हुए...
मुझे उन कसमों और कारणों के बारे में सोचना,
अच्छा लगता है।

रविवार, 9 मार्च 2008

'बल...'



बल...
बल क्या शब्द है?
कैसे इसका अनुभव हो !!!


बल नहीं समझा, तो क्या मैं निर्बल हूँ !!
निर्बल.. रक्षा जानता है।


अरे हाँ! .. रक्षा,
रक्षा करते रहने का एक संस्कार है।
'किससे'.. शब्द उसमें नगण्य है।


रक्षा समझ में आता है.. पर बल क्या है?
मुझमें बल है कि मैं...
इतना वज़न एक बार में उठा सकता हूँ!!!


नहीं, बल शब्द का अर्थ इससे पूरा नहीं होता।
कुछ और जो हमें बल देता है।
और जब भी बल होता है...
जैसे- कुछ कर देने का ...
कह देने का...
रह या सह लेने का...
तब भी, उससे भी कहीं अधिक बल...
छूटा रह जाता है,
.....'पाया जा सकता है'-
की आशा लिए।

इसका मतलब...
'बल एक शब्द है...,
जिसे पूरा अनुभव करने का बल,
हमेंशा सामने छूटा पड़ा रहेगा,
उसे उठा लेने का बल हमारे पास
कभी नहीं होगा।'

इसमें 'उठा लेना'..
शब्द नगण्य है।

'सही है...।'



सभी कह कह कर थक गए...
मर गए...
चले गए...
वहीं से हमने फिर कहना शुरु किया,
वैसा का वैसा..
रटा हुआ सा..
और सबने कहा... सही है।


लोगो के काम किए हुए सा चित्र..
हमने उन्हीं के सामने बना दिया,
कुछ काम किया है- का भ्रंम,
थोड़ा खुद को दिया...
थोड़ा लोगो में बाट दिया।
और सबने कहा... सही है।


हम अपना जीवन..
यूँ ही नहीं काट रहे हैं- के जवाब देते-देते,
थके हुए से हम...
वहीं नीरस चढ़े हुए फिर से चढ़ने लगे।
शिखर पर जगह बनाकर...
थोड़ा इसको हिलाकर..
थोड़ा उसको खिसकाकर...
हम बैठ गए..
फिर लेट गए..
और फिर सो गए।
सबने कहा... सही है।

सबसे पहले हमने क्या खाना सीख़ा,
अंड़ा या मुर्गी।
इस प्रश्न से जब हम बोर हुए तो...
इन्सान के अलावा जो भी चीज़ धरती पर हिली,
हमने उसे खुलेआम खाना सीख लिया।
एक बार मेरे खाने में एक बच्चे की उगंली मिली,
मैं डर गया...
इससे पहले कि लोगों को पता लगे कि...
हम इन्सान भी खाने लगे है..
मैं तुरंत उगंली गटक गया।
एक डकार ली और कहा-
'यार मटन कड़्वा था.. यार!!!
आदमी का था क्या?'
कुछ लोग हंसे...
और कुछ ने कहा... सही है।

'हम सब किसी मकसद से पैदा हुए है'- से विचार,
हम सबने...
दूध में घोल-घोल कर,
बचपन से पिए हैं।
फिर वो कहानियाँ भी हमने पढ़ी हैं...
रटी हैं...
जिन्होने हमें तो बोर किया,
पर उन्होने, हज़ारों मक़्सदो सी दीवारें,
हमारे चारों तरफ खड़ी कर दी।
अब मक़्सद नाम का मेरा घर है...
दूध पचता नहीं है...
हर सुबह एक अंगड़ाई लेकर कहता हूँ-
'कुछ करना है यार...'
और सब कहते हैं... सही है।

बहुत अमीर आदमी को..
बहुत अमीर आदमी बनाने के लिए...
हमने बहुत पढ़ाई की।
बहुत अमीर आदमी कभी,
बहुत अमीर आदमी नहीं हुआ।
हम बहुत पढ़ाई करने के बाद भी,
उसे बहुत अमीर आदमी नहीं बना पाए।
फिर हमने अपने बच्चे पैदा किए।
ढ़ेरों बच्चो को...
ढे़रों किताबों से लादकर..
उसी अमीर आदमी के बनवाएं स्कूलो में..
हमने उन्हें ढूस दिया।
स्कूल में बच्चों से पूछा-
'किसके बेटे हो।'
अमीर आदमी ने सिखाया-
'भगवान के...'
और हम सबने कहा...सही है।
सही है... सही है।

आप देख सकते हैं....

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