सोमवार, 12 जुलाई 2010

क्या मैं खेल रहा हूँ?



क्या मैं खेल रहा हूँ?
मैं पूरी तैयारी से आता हूँ....
सारे नियमों का रटा-रटाया सा नॄत्य तुम्हें दिखाता हूँ।
तुम नियमों के दूसरी तरफ खड़ी...
हंस देती हो...!!!

क्या मैं खेल रहा हूँ?
यह कहानी किसकी है?... इसे कौन पढ़ रहा है?
इस कहानी के पन्ने मुझॆ कभी तुम्हारे हाथों में नहीं दिखे...!
तुम्हारे नीयम क्या है?... उन नियमों की चाल क्या है?
क्या हम चल रहे हैं?

काश यह कहानी नहीं, नाटक होता...।
काश मैं अपना पात्र चुन सकता..।
काश मैं तुम्हें चुन सकता...।

क्या मैं खेल रहा हूँ?
तुम छुप जाती हो, मैं तुम्हें खोजता नहीं हूँ।
और तुम्हारे मिलते ही मैं तुम्हें ढूढ़ना शुरु कर देता हूँ।
तुम मेरा बचपन हो....।
उस बचपन की शरारत हो...।
बचपन खेल नहीं था...
जबकि मैं खेल रहा था।

क्या मैं अभी भी खेल रहा हूँ???

5 टिप्‍पणियां:

kushal ने कहा…

Itane bebaki se man ki bhaavnaao ko prastut karati rachnaae, man tehar gaya ya par.

डिम्पल मल्होत्रा ने कहा…

कुछ खास समझ नहीं आया..मेरी कमअक्ली है...

Apanatva ने कहा…

kuch sawalo ka hal swayam hee nikalna padta hai....

बाबुषा ने कहा…

Sundar hai.

Pratibha Katiyar ने कहा…

sundar

आप देख सकते हैं....

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