शनिवार, 24 नवंबर 2012

तू....

थोड़ी देर तक उसका नाम लेने से वह सपनों में चली आती है। देर तक मुझपर हंसकर वह मेरे पास बैठना चाहती है। जगह की कमी हम दोनों महसूस करते हैं... दुनिया कितनी बड़ी है... वह कहती है। मैं अपनी जगह् से भटक जाता हूँ। किंगफिशर सामने के पेड़ पर आकर मेरी ख़ाली बाल्कनी देखता रहता है। मैं देर तक बाल्कनी को भर देने की कोशिश करता हूँ..। हम एक दूसरे की ख़ाली जगह भर सकते थे... मैं तुम्हारे साथ बूढ़ा होना चाहता हूँ... मैंने अपनी गर्म सांसो में लपेटकर कई बार यह बात उसके पैरों के पास रखी थी। जीवन बहुत सरल था और हम फिर चालाक निकले....। हमने अपने बड़े होने के सबूत दिये.. खेल हमेशा बचकाना था। अब वह सपने में हैं... कहानी ख़ाली पड़ी है..। बाल्कनी में झूला लगाने की ज़िद्द जीवन मांगती है। और हम दोनों जीवन को चुन लेते हैं। सपने में वह कहती है.... और मैं सपनों में उसे जी लेता हूँ।

4 टिप्‍पणियां:

Himanshu Kumar Pandey ने कहा…

मोहक!
मुलायम-सी लेखनी!
आभार।

Pratibha Katiyar ने कहा…

Sapna...

vilom ने कहा…

गर्म साँसों में लपेटकर पैरों के पास रखी गयी बातें, बिलकुल वैसे ही जैसे हाथों की अंजुली में समेटी गयी धुप - मायने शाम को समझ आते हैं! बेहद असरदार लिखा है सर, आभार!

bidisha ने कहा…

Manav hum har pal bahut chalak hi nikalte hai..itna zyada ki sapne chhut jate hai zindegi se...bas kavi kavi neend me woh chale aate hai...subah ka sapna sach hota hai yeh jan ne ke bad vi hum mante nahi hai....hum apni apni zindegi jite hai...apki yeh 'tu' bahut bahut sahi hai....

आप देख सकते हैं....

Related Posts with Thumbnails