बुधवार, 28 मई 2008

एक शब्द...


एक शब्द...
थर-थर कांपता-सा,
पन्ने पर गिरा।
एक कहानी...
कविता के सुर में कही गई और नहीं कहीं गई,
जैसी बातों में पूरी हुई।
नाटक के से सुर में मैंने उसे,
डरते-डरते पढ़ा।
कहीं एक बच्चे ने,
थमे हुए पानी में एक पत्थर फैंका...।
और कहीं दूर,
अबाबील नाम की चिड़िया उड़ गई।

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

मानव, गुडगाँव की उस मुलाकात के बाद से ही आपका ब्लॉग लगातार देख रहा हूँ. बहुत सुंदर कवितायेँ.
लिखते रहिये.

शुभ,
हिमांशु.

प्रियम्बरा ने कहा…

bahut sunder. shabdon ka achha taalmel. Badhai ho.

Kiran ने कहा…

taareef ke liye lafz haath nahin aate hain..... itni khubsoorati hai aapke jazbaat mein ke jitna kaha jaaye utna kam hai.

आप देख सकते हैं....

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