
पीड़ा,बूंद-बूंद टपकती है, खाली घर में...
जैसे- थमे तालाब में कोई बच्चा..
बार-बार पत्थर मारे।
उस पत्थर से बने वृत्त,
पूरे तालाब को अस्थिर कर देते हैं।
घर स्थिर होने में अपना समय लेता है।
जैसे- थमे तालाब में कोई बच्चा..
बार-बार पत्थर मारे।
उस पत्थर से बने वृत्त,
पूरे तालाब को अस्थिर कर देते हैं।
घर स्थिर होने में अपना समय लेता है।
पीड़ा क्या है?
शायद अपने किसी रहस्य का बहुत भीतर बहते रहना।
पर किसी को पता चलते ही वो रहस्य..
पीड़ा नहीं रह जाता,
वो दुख हो जाता है...।
पीड़ा का टपकना... पलकों के झपने जैसा है।
अगर पलकों का झपकना..
किसी ज़िद्द में रोक दूँ...।
तो... आँखें छलक जाएगीं..
और पीड़ा, दुख बन जाएगा।
1 टिप्पणी:
Kanami sang imo blog. Daw spaghetti.
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