रविवार, 14 दिसंबर 2008

"मैं हिन्दु देश का मुस्लमान.."


मुझे अपनी “सीमा” में रहना है।
मैं अंतरिक्ष समझता हूँ, दुनियाँ जानता हूँ।
साँस लेने, खाने-पीने-सोने के भीतर-बाहर, मेरा एक देश है....
जिसे मैं पहचानता हूँ।
मैं एक हिन्दु देश का मुस्लमान हूँ।
मुझे अपनी “हदें” पता है, जैसे हर एक आदमी की अपनी ’हद’ है।
पर अभी कुछ ऎसी तिरछी-आड़ी लक़ीरें दिखती हैं।
जिसमें मेरी “हद”, वह “हद” नहीं है जो सबकी है।
यहाँ तक कि... मेरी “हद” अब “हद” भी नहीं रह गई है,
वह “सीमा” हो गई है।
अब मुझे अपनी “हद” में नहीं...
मुझे अपनी “सीमा” में रहना है।
अब मैं....
मैं अंतरिक्ष समझता हूँ, दुनियाँ जानता हूँ।
साँस लेने, खाने-पीने-सोने के भीतर-बाहर, मेरा एक देश है....
जिसे अब मैं नहीं पहचानता हूँ।

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

गांधी एक ब्रण्ण्ड बन कर रह गए है। लेकिन मै बात करता हुं असली गांधी की। गान्धी ही समाधान है। जिन्ना और नेहरु को दफन करना होगा। पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का एकीकरण ही एक मात्र समाधान है दक्षिण एसिया की तमाम मुश्किलो का।

विकास कुमार ने कहा…

कई बार ये सोचने की सोची कि मैं देश के बारे में क्या सोचता हूँ. कुछ खास समझ नहीं आया. देश के मायने - पहले समझे जाते रहे होंगे, अब ये शब्द निरर्थक सा लगता है. (और ये बम विस्फ़ोटों का क्षणिक प्रभाव भर नहीं) देश नाम का शब्द अब सिर्फ़ उसी वाक्य में दिखता है जिसमें कहीं ना कहीं समस्या-टाइप का कोई शब्द आता हो. और देश शब्द का सबसे सस्ता प्रयोग हम अपनी समस्याओं के 'एक्स्टेंशन' के रूप में जाहिर कर देते हैं.

आप देख सकते हैं....

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