
एक रत्ति विश्वास को गर गांठ में बांध लूं,
तो कह सकता हूँ कि....
वह विश्वास घात था।
नींद थी... सपना सा कुछ था।
खुद का, बहुत बड़ा सा एक पत्थर बना,
कांच की एक मेज़ पर टिक के पड़ा था।
एक छोटी चिड़ियाँ, दूसरी छोटी चिड़िया की नकल कर रही थी।
तन्हा नाम का एक बाज़ ऊपर आसमान में चक्कर काट रहा था।
एक पेड़ के कटने की आवाज़ दूर कहीं से आ रही थी।
उसी पेड़ पर एक आवाज़ और थी...
अपनी चोंच से...
छोटे-छोटे वार करती हुई एक चिड़ियाँ...
अपना घर बना रही थी।
चिड़ियाँ को पेड़ पर विश्वास था।
पेड़ को ज़मीन पर... आसमान पे।
और विश्वासघात,
उस आदमी का घर था, जिसके लिए वह पेड़ काट रहा था।
2 टिप्पणियां:
भावविभोर कर जाने वाली रचना |
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