शनिवार, 8 मार्च 2008

'दंगों के हम...'



एक दिन कोई बोलेगा- 'उठो',
और हम सब उठ जायेंगें।


जो जी रहे थे ...
वो सपना था।
हम डर जायेंगें...
ढूढेंगे उसे जिसने उठाया था।
पर वो कहीं नहीं होगा।


हमारे जिये की दुनियावी धूल झाड़कर,
बस एक बच्चों का सा सच, सामने खड़ा होगा।


जो अब तक पता नहीं किया वो सबको..
खुद-ब-खुद पता लग जाएगा।
जिसके लिए हम लड़ते रहे... वो असल में था ही नहीं।


हम घबरा जाएंगें...
क्योंकि अब सामना करना होगा...
सबको सबकी आँखो का।
फिर हम सब रोने की कोशिश करेंगें...
पर रो नहीं पाएंगें...।
हँस तो सकते ही नहीं..
क्योंकि..
जैसा जिया है... हमने ही जिया है।
जो किया है... हमने ही किया है।


बस एक दूसरे के लिए बहुत सारे प्रश्न होंगें हमारे पास..
पर पूछ नहीं पाएगें।
क्योंकि जवाब सबको पता होगें...
और वो इतने शर्मनाक होंगें...
कि हम छोटे होते जाएंगें।
इतने छोटे कि एक दूसरे को देख भी नहीं पाएंगें..।


और फिर हम सब भागना शुरु करेंगें... बदहवास से...
उस आदमी की तलाश में...
जो बोलेगा...-'सो जाओ'
और हम सब फिर से जीने लगेंगें।

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

JUGALI bahut pyari hi.DAHLIJ par 1 muskurata gahr hi.DHUNd to din ki tarh saf hi. 1dam opposite.nanga hone ka dar etna bada ho gaya ho gaya hi ki me ghar ho gaya hu.kya bat hi!DAHLIJ par 1kaccha phoos ka ghar hi. apke kuch bhav meri dayri me aa gaye hi aur pare ki tarh din bhar pure pannon par ludhakte rahtehi.andhra ke boy ko gud luck.samze?

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