शनिवार, 8 मार्च 2008

गलियां.. पगडंडियां



बहुत समय तक गलियों और पगडंडियों में जी लेने के बाद,
सीधी चौड़ी सड़क पर चलना...
अपनी ही गलियों और पगडंडियों से बेइमानी करना लगता है।
कुछ कहीं रोक लेता है...
पीछे खींच लेता है।
एक धना पेड़...
नदी का किनारा...
कुछ किताबें...
छोटी-छोटी बहुत सी बातें कहने की इच्छा से...
गुदे हुए पन्ने...
सभी सामने तैरने लगते हैं।
कभी इच्छा होती है कि सब भूल जाऊँ,
चल दूँ इस डामर की सड़क पर...
कुछ कदम तो रखना है, फिर ये भीड़..
खुद-ब-खुद बहा ले जाएगी।
और मैं गोल-गोल सबके साथ घूमने लगूँगा।

पर आगे कहीं,
सड़क के किनारे,
अगर एक पगडंडी पड़ी मिल गई तो!!!
तो क्या करुंगा...
शायद मुँह छिपा लूंगा,
या कह दूंगा कि- 'जल्दी आता हूँ'..
और भीतर प्रार्थना करुंगा कि कहीं ये झूठ पकड़ा न जाए।
पर अगर पगडंडी ने मुझसे पूछ लिया कि-
'कैसा लग रहा है... वहां?'
तो क्या जवाब दूंगा।
रो दूंगा शायद... अपनी बेइमानी पर,
या कह दूंगा-
'अजीब सवाल है!'
और फिर मुँह फेरकर गोल-गोल घूमने लगूंगा,
ये सोचते हुए कि-
'सच में.. कैसा लग रहा है... यहाँ?'

बहुत समय तक गलियों और पगडंडियों में जी लेने के बाद,
सीधी चौड़ी सड़क पर चलना...
अपनी ही गलियों और पगडंडियों से बेइमानी करना लगता है।
पता नहीं...
पर जब भी मैं इस डामर की सड़क को देखता हूँ,
तो मुझे मेले में देखा हुआ अंधे कुंए का खैल याद आता है।
मुझे उस खैल दिखाने वाले पर बड़ी दया आती थी।
सो एक बार मैं...
खैल के बाद उससे मिला...
और चिल्लाने लगा...
ये क्या खैल है?
एक ही जगह गोल-गोल धूमने का?
क्या मिलता है तुम्हें?
क्यों करते हो ऎसा?
वगैरह-वगैरह!
उसने मेरा हाथ पकड़ा और खीचकर..
कूंए के भीतर ले गया और कहा-
'ऊपर देखो'
मैंने देखा कुंए के चारों तरफ...
मुझे सिर्फ लोगों के सिर दिखाई दे रहे थे,
जो उसे देखते ही दोनों हाथ उठाकर चिल्लाने लगे।
उसने कहा-
'ये इतने सारे लोगों की अपेक्षा है कि मैं फिर,
बार-बार,
लगातार गोल-गोल घूमता रहूँ।'

ये बात मुझे तब समझ में नहीं आई थी,
पर अब लगता है.. वो सही था।
हमारा चलना- 'अपेक्षा के गोल चक्करों से होता हुआ,
अपेक्षित के गोल चक्कर बनाने तक है।'

पर इसमें एक बात..
जो लगातार मुझे कहीं-न-कहीं रोक लेती है कि-

बहुत समय तक गलियों और पगडंडियों में जी लेने के बाद,
सीधी चौड़ी सड़क पर चलना...
अपनी ही गलियों और पगडंडियों से बेइमानी करना लगता है।

2 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

आप ने अपनें म्नोभावों की बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति की है।

बेनामी ने कहा…

1st time march is very good to me.u know why? ur peotry slitly changing t colour.altime sad brown is changing in a MONALISA SMILE.though i do.nt understand this smile but iknow smil;e is spreding all over lively.Dadly waiting yr comments.MAY I?

आप देख सकते हैं....

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