रविवार, 9 मार्च 2008

'बाज़ार...'



कब हमें हमारा जंगल मिलेगा?,
कब तक हम यूँ ही उगते फिरेंगें?


रोज़ दिन बीतने की गति में....मैं..
बार-बार बोया गया बीज की तरह।
अब मैं हर कहीं उगता फिरता हूँ...
बार-बार पैदा होने की गति में।


भीतर बहुत बार पैदा हुआ मैं,
इस भीड़ में.. अपनी बहुत सी भीड़ लिए,
एक बार फिर जनने की तैयारी करता हूँ ।
कहीं ज़मीन उपजाऊ है, तो कहीं बंजर है।
पर इस लगातार चल रहे संभोग में...
अब ज़मीन भी माने नहीं रखती,
संभोग इतना आँखो के सामने है,
कि भीतर किसका जंगल है, ये जानना मुश्किल है।


इस सब में-
'मैं कौन था?' से 'मैं कौन हूँ?' तक के सारे विचार,
इस जंगल में लुप्त होते जानवर हैं।


अब जो भीतर बचा हुआ जानवर कभी दहाड़ता है,
वो दहाड़..
ऊपर आते-आते एक ऎसे शब्द का रुप ले लेती है।
कि हम अंत में किसी न किसी का प्रचार करते पाये जाते हैं।


इस पूरे बाज़ार में,
ये प्रश्न कितना हास्यास्पद हो जाता है-
कि कब हमें हमारा जंगल मिलेगा?,
और कब तक हम यूँ ही उगते फिरेंगें?

1 टिप्पणी:

Malay M. ने कहा…

Aapki pehli kavita jo bilkul samajh main nahin aayee ... rahasyavaad ka put hai ... thoda sa darshanshastra hai ... saath main shaayad kuch katutaa bhi ... yeh kavita vedanaa se upji hai ya kshubdhtaa se , kehna mushkil hai ... kya yah ek naujawaan , jeevan se bharpoor kavi ka nirashavaad ki or pehla kadam hai ( 'na' ka jawaab kavita main dikhataa nahi, 'haan' ka jawaab main sunane wala nahin .. )...

Kshamaa karein ... yeh kavitaa bilkul samajh main nahi aayee ...

आप देख सकते हैं....

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