गुरुवार, 21 फ़रवरी 2008

माँ





धूप चेहरा जला रही है,
परछाई, जूता खा रही है,
शरीर पानी फेंक रहा है,
एक दरख़्त पास आ रहा है।



उसके आंचल में मैं पला हूँ,
उसके वात्सल्य की साँस पीकर,
आज मैं भी हरा हूँ।
आप विश्वास नहीं करेंगें,
पर इस जंगल में एक पेड़ ने मुझे सींचा है।
मैं इसे माँ कहता हूँ।



जब रात शोर खा चुकी होती है,
जब हमारी घबराहट, नींद को रात से छोटा कर देती है,
जब हमारी कायरता, सपनों में दखल देने लगती है।
तब माथे पर उसकी उंग्लियाँ हरकत करती हैं
ओर मैं सो जाता हूँ...।

3 टिप्‍पणियां:

mehek ने कहा…

bahut khubsurat,maa ki chaya aisi hi hoti hai.
http://mehhekk.wordpress.com/

shruti ने कहा…

very beautifully depicted

Shefali Tripathi Mehta ने कहा…

the imagery is striking. bahut badhai is khobsoorat rachna ke liye.

आप देख सकते हैं....

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