मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008

'विश्वासघात..'



'दुनिया चल रही है'- में..
मैं हर रात सोता हूँ लगभग..


एक विश्वास के साथ,
कि मैं हर सुबह उठूंगा
और वहीं से... फिर से जीना शुरु कर दूंगा,
जहां से मैंने- पिछली रात जीना छोड़ा था।


ये मृत्यु को चख़ने जैसा भी है,
उसका स्वाद लेना
और फिर जीने लगना।


हर बार ऎसा करते रहने में...
उस विश्वास में विश्वास इतना बढ़ जाता है कि-
'मृत्यु को चख कर वापिस आना'
स्वाभाविक लगने लगता है...
सामान्य सी बात।


पर तभी..
उस क्षण आप डर जाते हैं,
जब किसी सुबह आप हड़बड़ा कर उठते हैं।
कुछ समय लगता है... वापिस,
फिर इसी दुनियाँ में आने में।
क्या था ये?
नींद?
या मृत्यु?
सपना कुछ भी नहीं था,
बस एक काली छाया थी।
जिसे आप जैसे-तैसे चकमा देकर बाहर निकल आए,
वापिस इस दुनियां में।


और तब पहली बार...
आप उस विश्वासघात को सूंघ लेते हैं,
जो आज तक आपके साथ,
विश्वास नाम से बड़ा हो रहा था।

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