मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008

'धुंध...'



एक धुंध है-
जो धीरे-धीरे, परत-परत
सब कुछ भुलाती जाती है।


एक इच्छा है-
जो कहती है.. चल,
फिर हल्के-हल्के उस धुंध को मिटाती जाती है।


एक मन है-
जो कुछ नया जीने में धुंध को धुंआ देता है,
और अपने ही जीए हुए साल के साल गायब हो जाते हैं।


कुछ चेहरे हैं-
जो इसलिए धुंध में खो गए थे,
कि हम बड़े हो सकें...
और हम बड़े होते गए।


एक आस्था है-
जो उस माँ की तरह है,
जो मरने तक आपका साथ देती है।


एक हमारी आस्था है-
जो उस माँ की तरह है,
जो हमेशा दरवाज़ा खटखटाती रही...
पर हम घर पर थे ही नहीं।


एक दुनिया है-
जो कैसे चलती है का पता नहीं है,
पर इस दुनिया में मैं कैसे चलूँगा...
की ज़िद्द बड़ी है।


एक ज़िद्द है-
जो उस मकान की तरह है,
जिसकी किस्तें आपको पूरी ज़िंदगी देना पड़ता है।


एक दर्द है-
जो दीवाली के पटाखों की तरह आस पास ही फूटता है,
और अगर नहीं फूटे...
तो अचानक फूट पड़ेगा का डर हमेशा बना रहता है।


एक लड़ाई है-
जो बड़े दुश्मन के खिलाफ़ शुरु हुई थी,
पर अब बहुत से कारणों के साथ...
सारे विरोधी.. अपने ही खेमे में हैं।


कुछ तर्क हैं-
जो छुट्टे पैसों की तरह..
लोगों की जेबों में पड़े रहते हैं...
जब भी चलते हैं.. खनक उठते हैं।


एक धर्म है-
जो रात में आपके उस काम की तरह होना चाहिए...
जिसकी चर्चा आप सुबह...
अपनी माँ से नहीं कर सकते।


एक धर्म है-
जो उस पहलवान की तरह हो गया है...
जिसके नाम की आड़ में कोई भी पत्थर चला सकता है।


एक अकेलापन है-
जो उस फोड़े की तरह है,
जिसके साथ रहने की अगर आपको आदत न हो...
तो वो नासूर बन जाता है,
और अगर आदत पड़ जाए...
तो अकेले.. उसे खुजाने में बहुत मज़ा आता है।


एक खोज है-
जो घर में चश्मा ढूँढने जैसी है...
जब ढूँढ-ढूँढकर थक जाओ...
तब मुँह पे पड़ा मिलता है।


एक भगवान हैं-
जो सर्कस के जोकर हो गए हैं,
जब तक चमत्कार दिखाएंगे...
इस सर्कस में बने रहेंगें।


एक अहिंसा है-
जिसका सिक्का लिए..
गाँधी जी हर शहर के बीच में खड़े हैं।
पर जब भी सिक्का उछालते हैं..
हिंसा ही जीतती है।


एक त्रासदी है-
कि हमें कविताएं समझ में नहीं आती...


एक त्रासदी है-
कि हम सब जानते हैं...


और एक त्रासदी है-
कि ये सपने हैं...
पता नहीं क्यों?
साले अभी भी आते हैं।

4 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

बढिया रचना है।

और एक त्रासदी है-
कि ये सपने हैं...
पता नहीं क्यों?
साले अभी भी आते हैं।

mehek ने कहा…

bahut sundar bhav

जोशिम ने कहा…

[क्या बात है] .... और ...साँस जो फूलती है हर नई सीढ़ी ? - बहुत बहुत मज़ा आया - मनीष

Shefali Tripathi Mehta ने कहा…

eloquent. excellent imagery.

आप देख सकते हैं....

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