रविवार, 24 फ़रवरी 2008

'शब्द द्रृश्य...'



एक वो जो 'छू गया होता भीतर तक'- सा शब्द,
तुमने कहा नहीं... दिखा दिया।

मैं वहीं था,
उस अनकहे शब्द से बने, द्रृश्य के सामने।
एकटक खड़ा,
अपनी अधूरी नींद के बारे में सोचता सा।

किसी शब्द के हिज्जे कर दिए सा,
वो द्रृश्य मैंने देखा था तब...
वो आज इतने सालों बाद, जुड़ा है पूरा।

सीधा शब्द कह देने का संस्कार तुममें नहीं था,
और द्रृश्य का अर्थ जानने की समझ मुझमें नहीं।

तुम बहुत आगे थी...
मैं वहीं खड़ा था...
तुम अब ओझल हो...
तो ये द्रृश्य बना है।

पहले मैं भाग रहा था।
अब मैं.. स्थिर, नज़रें झुकाए वहीं खड़ा हूँ।

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