शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008

'ठीक तुम्हारे पीछे'...



मैंने हर बार रख दिया है,
खुद को पूरा का पूरा खोलकर।
खुला-खुला स बिखरा हुआ, पड़ा रहता हूँ।

कभी तुम्हारे घुटनों पर...
कभी तुम्हारी पलकों पर...
तो कभी ठीक तुम्हारे पीछे।

बिखरने के बाद का, सिमटा हुआ सा मैं,
'था'- से लेकर -' हूँ ' तक...
पूरा का पूरा जी लेता हूँ, खुद को - फिर से।

मेरे जाने के बाद तुम शायद मुझे पढ़ लेती होगी,
कभी अपने घुटनों पर...
कभी अपनी पलकों पर...
पर जो कभी 'ठीक तुम्हारे पीछे'- बिखरा पड़ा था मैं, वो...
वो शायद पड़ा होगा अभी भी-
की आशा में,
मैं.. खुद को समेटे हुए,
फिर से आता हूँ तुम्हारे पास,
फिर,
बार-बार, और हर बार,
छोड़ जाता हूँ, थोड़ा-सा खुद को...
ठीक तुम्हारे पीछे।

5 टिप्‍पणियां:

Parul ने कहा…

hmmm....ajab si..kuch yaad dilaaney jaisii......aapka blog yaad rakhna padegaa....baar baar padhney jaisaa

मीत ने कहा…

I've probably not identified with anything more than this in a long long time ..... So simple, and simply, so true ( of me, too ).
This one is too good boss. Or is it too good to be true ?? ( This time of me, only )

MANAV ने कहा…

thanx meet...
lovely to know that u like it..
thanx

manav

mayur more ने कहा…

this is the one of the best poem i ever read in my life.....

bhanu ने कहा…

Hey I really like ur blog Manav. Keep writing. I too have blog Mankamaun.blogspot.com come der. U never hamare Maun Takra kr Shabd ban jaye.

आप देख सकते हैं....

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